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खरी खरी पत्रकारिता की दिनों दिन गिरती साख नीरज द्विवेदी
  • Updated: anokhiaawaj.in | Feb 20, 2020, 14:22 PM IST
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अनोखी आवाज़ न्यूज़ (नीरज द्विवेदी)। आज तो मैं खरी-खरी कहता हूं,बुरा नही लगना चाहिए,क्योकि मैं जो देखता और सुनता हूं वही कहता हूं,यदि फिर भी बुरा लगता है तो मैं क्या करूँ...?

पत्रकारिता का पेशा लोकतंत्र का चौथा खंभा माना जाता है। इसमें कोई दो राय भी नहीं हो सकतीं कि अगर इस पेशे से जुड़े लोग अपना दायित्व ठीक ढंग से निभाएं तो समाज और राष्ट्र में अनूठा परिवर्तन दिखाई दे सकता है परन्तु ऐसा नहीं हो रहा है। जनता की नजरों में आज पत्रकारों के प्रति कितना आदर है, अगर यह फेसबुक के जरिए जानें तो खुद पत्रकार भी शर्मिन्दा हो जाएं क्योंकि फेसबुक पर जितनी गालियां भ्रष्ट  नेताओं को दी जाती हैं, उनसे कहीं ज्यादा भद्दी गालियां मीडिया से जुड़े लोगों को रोज दी जा रही हैं। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि समूचा मीडिया भ्रष्ट है, सब पत्रकार अयोग्य हैं, बिके हुए हैं, पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं, पर


्तु यह भी सच्चाई है कि इस पेशे की साख दिन-ब-दिन गिर रही है।  और इसका कारण कुछ हद तक बिगड़ता वातावरण है और कुछ ऐसे लोग इस पेशे में आ घुसे हैं जिनका पत्रकारिता से दूर दूर का कोई वास्ता कभी नहीं रहा बल्कि अद्भुत तरीकों से वे पैसा बनाने की लालसा से इसमें चले आए हैं। 
उनकी नजर केवल कुछ न कुछ, किसी न किसी तरीके से पा लेने के लिए ऐसे स्रोतों पर लगी रहती है जहां उनका काम बन जाए। समाज ने भी ऐसे लोगों को बढ़ावा दिया है, उनकी आदतें खराब की हैं, उन्हें लालची बनाया है, उन्हें भ्रष्ट किया है, उन्हें उनके रास्ते से भटकाया है। जरा सोचिए, अगर आप कोई अच्छा सामाजिक या राष्ट्रहित का काम कर रहे हैं तो आपको पत्रकारों के मस्का लगाने की क्या जरूरत है, उनकी चापलूसी क्यों करनी चाहिए? यदि काम अच्छा है तो मीडिया तक सूचना पहुंचाई जाए और कवरेज का आग्रह किया जाए। इतना ही करना होता है। यदि कोई अखबार या पत्रकार अपने कम संसाधनों के कारण वह कार्यक्रम कवर कर पाने में असमर्थता जताए तो उस कार्य या कार्यक्रम का पूरा विवरण उनके कार्यालय तक पहुंचाया जा सकता है। यदि वास्तव में मैटर, संबंधित पत्र-पत्रिका के अनुरूप है और वहां बैठा संपादकीय विभाग का व्यक्ति योग्य और पेशे के प्रति निष्ठावान है तो उस समाचार को स्थान अवश्य देगा।


यदि डेस्क पर वास्तव में पत्रकार बैठा है और फिर भी समाचार नहीं छपता है तो इसका सीधा सा मतलब है, वह समाचार-सामग्री स्थान पाने योग्य नहीं रही होगी। लेकिन आजकल कुछ और ही दिखाई दे रहा है। विशेषकर इधर दक्षिण में ही देखने को मिल रहा है। समाचार छपवाने का अनूठा तरीका इजाद हुआ है। देश के किसी भी हिस्से में बिना किसी कारण पत्रकारों का आए दिन, चलते फिरते सम्मान नहीं किया जाता लेकिन यहां केवल मीडिया से जुड़े होने मात्र से कोई भी व्यक्ति अतिविशिष्ट व्यक्ति बन जाता है। इधर पत्रकारों को कुछ ज्यादा ही मस्का लगाया जाता है। लगता है, सामाजिक संस्थाओं के कुछ पदाधिकारी पत्रकारों को किसी तीसरी दुनिया से आया हुआ अजूबा समझते हैं। उन्हें किसी वीवीआईपी से भी ज्यादा सम्मान दिया जाता है। ऐसा भी नहीं है कि सभा- संगठन वालों को इन पत्रकारों से बहुत लगाव है या इनकी आत्मीयता के वशीभूत वे इन्हें पलकों पर बिठा रहे हैं या इनके कामकाज का वे सम्मान करते हैं। बिल्कुल नहीं। यही पदाधिकारी उन पत्रकारों की पीठ पीछे से उनकी असलियत उजागर करते दिखाई दे जाते हैं। उनकी करतूतों की जानकारी देते हैं। दरअसल कुछ लोगों को अखबार में अपनी फोटो और नाम देखने का इतना शौक है कि वे पत्रकारों की चाटुकारिता से भी नहीं शर्माते। बिना किसी कारण के पत्रकारों का शाल और माला द्वारा सम्मान कर उनको मस्का लगाया जाता है ताकि सम्मानित करने वालों का बदले में वह पत्रकार भी ध्यान रखे। ‘‘गिव एन्ड टेक’’ की कहावत को चरितार्थ करने में समाज के ऐसे लोग पीछे नहीं हैं। पत्रकारों को बिगाड़ने का काम कर रहे हैं। किसी संवाददाता की जेब में पांच सौ का नोट डालकर उसे अनुग्रहित कर समाचार में अपनी खास जगह बना लेते हैं तो किसी ने इसके लिए दूसरे रास्ते निकाल लिए हैं। वास्तविक कार्यकर्ताओं को यह सब करने की क्या जरूरत है? रिश्‍वत देना या मस्का लगाना उनका काम है जो अपनी सेवा से कई गुना ज्यादा कवरेज चाहते हैं। काम करने वाले का नाम तो अपने आप होता है, कोई छिपाए तो भी नहीं छिपता।
किसी पत्रकार को सम्मानित करना अनुचित है, यह बात मैं कतई नहीं कहता। सम्मानित करने का कोई कारण तो होना चाहिए। यदि आपके संगठन के लिए किसी अखबार या पत्रकार ने कोई विशेष उल्लेखनीय योगदान किया हो तो उसे अवश्य मंच पर बिठाएं, शाल ओढाएं, माला पहनाएं। उस पत्रकार के सहयोग का बखान भी करें परन्तु केवल समाचार छापने के एवज में या भविष्य में ज्यादा छपवाने के लालच में आप किसी पत्रकार को सम्मानित करते हैं तो यह सम्मान नहीं बल्कि एक स्वार्थ है, तमाशा है। आजकल तो भीड़ में भी अगर कोई पत्रकार दिख जाए तो मंच पर बुलाकर उसे माला पहना दी जाती है। इतना ही नहीं, पत्रकार तो छोड़िए, किसी अखबार के दफ्तर का कोई भी कर्मचारी किसी कार्यक्रम में आयोजक को दिखाई दे जाए, तो उसे भी सम्मानित कर दिया जाता है। कोई विज्ञापन एजेंट, कोई मार्केटिंग का, प्रबंधन का व्यक्ति दिख जाए तो उसे सम्मानित कर दिया जाता है। यह कोई पत्रकारिता का सम्मान नहीं है। सामाजिक संगठनों से जुड़े जो लोग ऐसा करते हैं, वे समाज के लिए अच्छा नहीं करते। पत्रकारों की ऐेसी ओछी चापलूसी बंद होनी चाहिए। अंग्रेजी या भाषाई अखबारों के पत्रकारों को देखिए, क्या वे सार्वजनिक मंचों पर आपको जब-तब शाल, माला पहनते दिखाई देते हैं? कोई एक दो उदाहरण ही खोज कर बता दीजिए। शायद ही ऐसा देखने को मिले। पत्रकारिता पेशे में भी भले-बुरे सभी प्रकार के लोग होते हैं क्योंकि अन्य क्षेत्रों की तरह यह भी एक क्षेत्र है परन्तु हमें तो कम से कम अपनी ओर से इस पेशे को बद से बदतर बनाने के बजाय बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। आज जागरूक पत्रकारिता की वजह से देश जागरूक हो रहा है। प्रशासन और राजनेता अगर किसी से भय खाते हैं तो वह मीडिया ही है परन्तु यही मीडिया अब तेजी से बदनाम भी हो रहा है। कम से कम हम समाज के भले की बातें करने वाले लोग तो मीडिया को भ्रष्ट न करें, पथ भ्रष्ट न करें और भटकने वाले रास्ते न दिखाएं। मीडिया से जुड़े लोगों का आदर-सम्मान करना अलग बात है और चापलूसी करना अलग बात। सम्पर्क, स्नेह, आदर अनुचति नहीं, स्वार्थभरी चाटुकारिता से आपकी साख गिरेगी, पत्रकारिता को तो बट्टा लगेगा ही। एक और बड़ी समस्या है अक्सर पत्रकारों का बौध्दिक स्तर उतना परिपक्व ही नहीं होता कि वो निष्पक्ष और गहन विश्लेषण कर पायें। विशेषकर छोटे रायों में घटिया अथवा बिखरी हुई कवरेज के बीच गलाकाट प्रतियोगिता में प्रकाशन व चैनलों के बंद होने व पुन: प्रारम्भ होने का खेल चलता रहता है। वही प्रकाशन व चैनल सफल है जिसका राय सरकारों से बेहतर तालमेल है। ऐसे में सस्ती जमीन, मोटे विज्ञापन, विभिन्न सुविधाएं और मालिकों को व्यापारी फायदे के साथ-साथ राजनैतिक पद भी मिलना संभव हो जाता है। उसी अखबार की पाठक संख्या अधिक होती है जो स्थानीय समाचारों व चटपटी खबरों को वरीयता देते है। ऐसे में उत्कृष्ट सम्पादकीय व सारगर्भित बहस और आवश्यक मुद्दे उठाने जैसी बात अखबार व चैनलों से बेमानी है। आज दैनिक अखबारों में खबरों को पाने के लिए नई-नई तकनीकियों को अपनया जा रहा है जैसे रिर्काडिंग करना, फोटो लेना, रिश्वत देना व लेना मेरे विचार से यह पत्रकारिता के लिए सही नहीं है। पत्रकारिता में नैतिकता और मर्यादा की तमाम सीमाओं को लांघना ठीक नहीं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ धीरे-धीरे ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच जाएगा।





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